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ईरान की वायु रक्षा प्रणाली की कमजोरियों पर सवाल उठे

हाल ही में अमेरिका और इजराइल के समन्वित हवाई हमलों ने ईरान की वायु रक्षा प्रणाली की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं। इन हमलों ने ईरान की प्रमुख सैन्य संरचनाओं को नष्ट कर दिया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि ईरान की वायु रक्षा प्रणाली, जिसमें रूसी S-300 और चीनी HQ 9B शामिल हैं, आधुनिक स्टेल्थ तकनीक के सामने कमजोर साबित हो रही है। इस घटनाक्रम का सामरिक महत्व है, क्योंकि यह संकेत देता है कि आधुनिक युद्ध में केवल लंबी दूरी की मारक क्षमता ही पर्याप्त नहीं है।
 

ईरान की वायु रक्षा क्षमता पर संकट

अमेरिका और इजराइल द्वारा शनिवार से शुरू किए गए समन्वित हवाई हमलों ने ईरान की प्रमुख सैन्य संरचनाओं को नष्ट कर दिया है, जिससे तेहरान की वायु रक्षा क्षमताओं पर गंभीर प्रश्न उठ खड़े हुए हैं। ईरान की वायु रक्षा प्रणाली में रूसी S-300 मिसाइल प्रणाली, चीनी HQ 9B सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली और स्वदेशी बावर 373 जैसी प्रणालियाँ शामिल हैं। फिर भी, ये प्रणालियाँ अमेरिका और इजराइल के अत्याधुनिक और स्टेल्थ विमानों के सामने प्रभावी प्रतिरोध नहीं कर सकीं।


रूसी S-300 एक शीत युद्ध काल की वायु रक्षा प्रणाली है, जिसका उपयोग आज भी कई देशों द्वारा किया जा रहा है। यह एक लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली है, जिसे दुश्मन के लड़ाकू विमानों और बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिए विकसित किया गया था। हालांकि, यह प्रणाली आधुनिक स्टेल्थ तकनीक और जटिल इलेक्ट्रॉनिक युद्धक रणनीतियों के सामने कमजोर साबित हुई है।


HQ 9B प्रणाली की सीमाएँ

चीन द्वारा विकसित HQ 9B प्रणाली को रूसी S 300 PMU और अमेरिकी पैट्रियट PAC 2 से प्रेरित माना जाता है। इसका परीक्षण पहली बार 2006 में किया गया था और यह पिछले एक दशक से चीन के संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात है। इसकी मारक क्षमता लगभग 260 किलोमीटर है। ईरान ने हाल ही में अपनी मिसाइल रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए इसे शामिल किया था।


हालांकि, रिपोर्टों के अनुसार, यह प्रणाली अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमलों को रोकने में असफल रही है। यह दूसरी बार है जब HQ 9B प्रणाली आधुनिक हवाई हमलों के सामने अप्रभावी साबित हुई है। पिछले वर्ष ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान भी इसी प्रणाली के सहारे भारतीय हवाई हमलों को रोकने में असफल रहा था।


हमलों की रणनीति

अमेरिका और इजराइल ने अत्याधुनिक स्टेल्थ लड़ाकू विमानों, जैसे कि F 35 लाइटनिंग II, और स्वार्म ड्रोन रणनीति का उपयोग किया। इन हमलों में सबसे पहले ईरान के वायु रक्षा रडार और कमांड नेटवर्क को निशाना बनाया गया, जो किसी भी वायु रक्षा प्रणाली का तंत्रिका तंत्र माना जाता है। रडार और सेंसर नेटवर्क को निष्क्रिय कर मिसाइल लांचर और कमांड सेंटर के बीच का समन्वय तोड़ दिया गया, जिससे पूरी रक्षा व्यवस्था लगभग अंधी हो गई।


HQ 9B प्रणाली को मुख्य रूप से ऊँचाई से आने वाले खतरों के लिए डिज़ाइन किया गया था, लेकिन स्टेल्थ विमानों और कम ऊँचाई पर तेजी से आने वाली सटीक निर्देशित मिसाइलों के खिलाफ यह प्रभावी प्रतिक्रिया नहीं दे सकी। कम ऊँचाई पर तेजी से बढ़ती मिसाइलों ने प्रतिक्रिया का समय बहुत सीमित कर दिया। साथ ही, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तकनीकों और सेंसर दमन ने भी इसकी कार्यक्षमता को बाधित किया।


सामरिक महत्व

इस घटनाक्रम का व्यापक सामरिक महत्व है क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि मिश्रित तकनीक आधारित वायु रक्षा ढांचे, जिनमें विभिन्न देशों की प्रणालियाँ शामिल हों, यदि पूरी तरह एकीकृत न हों तो संकट की घड़ी में कमजोर पड़ सकते हैं। साथ ही, स्टेल्थ तकनीक और नेटवर्क केंद्रित युद्ध प्रणाली पारंपरिक मिसाइल रक्षा ढांचे के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है।


यह संकेत भी देता है कि आधुनिक युद्ध में केवल लंबी दूरी की मारक क्षमता पर्याप्त नहीं है, बल्कि सेंसर, डेटा लिंक, इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र की मजबूती भी उतनी ही आवश्यक है। इस विफलता से चीन और रूस की रक्षा निर्यात छवि पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि उनके सिस्टम अत्याधुनिक पश्चिमी तकनीक के सामने कमजोर दिखे हैं।


बहरहाल, यह घटनाक्रम पश्चिम एशिया की सामरिक संतुलन व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। यदि ईरान की वायु रक्षा में इस तरह की कमजोरियाँ बनी रहती हैं, तो क्षेत्र में शक्ति संतुलन अमेरिका और इजराइल के पक्ष में झुक सकता है। साथ ही, यह अन्य देशों को भी अपनी वायु रक्षा रणनीतियों की समीक्षा करने के लिए प्रेरित करेगा।